भ्रष्ट व्यवस्था या तन्त्र एक सामान्य नागरिक/कर्मचारी/उद्यमी का जीवन किस प्रकार से बर्बाद कर सकती है इस बात से आप अनुमान लगा सकते हैं युवावस्था में व्यक्ति का जैसा निर्मल चरित्र होता है किन्तु इस क्रूर समाज और व्यवस्था में अनुकूलन बनाने में ही वह अपना सबकुछ अर्थात वास्तविक चरित्र भी खो देता है मेरी स्वयं की जानकारी में ऐसे कई उदहारण हैं जो अपनी युवा अवस्था में स्वच्छ व निर्मल छवि के थे किन्तु इस भ्रष्ट तन्त्र/व्यवस्था ने उनको समय-समय पर इतना पीटा और पीड़ा दी है कि आज वो उसी भ्रष्ट तन्त्र का हिस्सा बनकर रह गए हैं अर्थात उन्होंने अपना चरित्र खो दिया है केवल जीवित लास हैं|
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