Monday, 21 August 2023

भ्रष्ट व्यवस्था

भ्रष्ट व्यवस्था या तन्त्र एक सामान्य नागरिक/कर्मचारी/उद्यमी का जीवन किस प्रकार से बर्बाद कर सकती है इस बात से आप अनुमान लगा सकते हैं युवावस्था में व्यक्ति का जैसा निर्मल चरित्र होता है किन्तु इस क्रूर समाज और व्यवस्था में अनुकूलन बनाने में ही वह अपना सबकुछ अर्थात वास्तविक चरित्र भी खो देता है मेरी स्वयं की जानकारी में ऐसे कई उदहारण हैं जो अपनी युवा अवस्था में स्वच्छ व निर्मल छवि के थे किन्तु इस भ्रष्ट तन्त्र/व्यवस्था ने उनको समय-समय पर इतना पीटा और पीड़ा दी है कि आज वो उसी भ्रष्ट तन्त्र का हिस्सा बनकर रह गए हैं अर्थात उन्होंने अपना चरित्र खो दिया है केवल जीवित लास हैं| 

Friday, 18 August 2023

कलियुग

 भारतीय मान्यताओं के अनुसार समय का विभाजन कुल चार युगों में किया गया है 1. सतयुग लगभग 17 लाख 28 हजार वर्ष, त्रेतायुग 12 लाख 96 हजार वर्ष, द्वापर युग 8 लाख 64 हजार वर्ष तथा कलियुग 4 लाख 32 हजार वर्ष का माना जाता है| किन्तु इन सभी में जो ध्यान देने योग्य बात है, ज्ञात जानकारी के अनुसार जितना पाप और अत्याचार कलियुग में हो रहा है उतना किसी भी युग में नहीं हुआ, कारण चाहे कलियुग के चरित्र का हो या कुछ और इसमें सुधार लाने की आवश्यकता है जो मानव जाति स्वयं कर सकती है|

Friday, 9 September 2022

मनुष्य का ज्ञान!

        मनुष्य स्वयं को ज्ञात ब्रह्मांड का सर्वश्रेष्ठ प्राणी इसलिए नहीं मानता कि वह वसुंधरा पर आश्रित समस्त प्राणियों पर नियंत्रण करता है या स्वयं के जीवन को सुखमय बनाने हेतु नाना प्रकार के आविष्कारों को जन्म देता है बल्कि मनुष्य इस पृथ्वी का श्रेष्ठ प्राणी इसलिए माना जाता है क्योंकि वह बुद्धि/ विवेक व ज्ञान में श्रेष्ठ है। यही कारण है कि मनुष्य ने अपनी कल्पनाशक्ति के बल से संसार में समय - समय पर अनेक अविष्कार किए हैं। जिनमे कुछ सर्वाधिक महत्वपूर्ण अविष्कार मानव जाति के प्रचलित हैं जैसे आग की खोज, पहिए की खोज, बिजली की खोज, सूचना क्रांति का आगमन एवं भविष्य में होने वाला सर्वाधिक महत्वपूर्ण आविष्कार कृत्रिम बुद्धिमत्ता जो मनुष्य के जीवन को एक नए आयाम तक ले जायेगा।।

Thursday, 8 September 2022

संघर्ष!

शायद संघर्ष "शब्द" का उपयोग सर्वप्रथम सत्ता को हथियाने हेतु कुलीन लोगों या राजतंत्र में उच्च पदस्थ लोगों द्वारा किया जाता था जिसके अंतर्गत वर्षों तक सत्ता का संघर्ष चलता रहता था इस संघर्ष की पराकाष्ठा वंश के विनाश तक जाती थी। और जब तक एक वंश या परिवार का संपूर्ण विनाश न हो जाए तब तक शायद यह संघर्ष चलता रहता था। किंतु आज के समय में संघर्ष "शब्द" का दुरुपयोग उच्च पदस्थ लोगों द्वारा अपने स्वार्थ सिद्धि हेतु इस प्रकार किया गया जैसे "संघर्ष" संघर्ष नहीं बल्कि एक दैनिक परिश्रम हो अर्थात जीवन निर्वाह हेतु कर्म, दिन के भोजन प्राप्ति हेतु कर्म, स्वस्थ शरीर बनाए रखने हेतु कर्म, कोई राजकीय या शशकीय सेवा प्राप्ति हेतु कर्म, अच्छी शिक्षा प्राप्ति हेतु कर्म इत्यादि को "संघर्ष" उच्चारित किया गया ताकि इस जगत का 90 फीसदी मनुष्य उक्त कर्मो को भाग्य मानकर संघर्ष करता रहे और 1 फीसदी सत्तासीन दुर्दांत/वहशी/हत्यारों को कुत्सित सत्ता से बेदखल करने या व्यवस्था परिवर्तन की बात न कर सके।।

Saturday, 6 August 2022

The Truth (सत्य)

भारत, शिर्फ़ एक राष्ट्र रूपी भौगोलिक सीमा नहीं है बल्कि उससे कहीं अधिक, यहाँ के मूल निवासियों के लिए एक भावनात्मक और संवेदी अंग है जो उनको एक प्रकार की ऊर्जा प्रदान करने का कार्य करता है| आपने बहुत से सफल लोगों की आत्मकथा में सुना होगा क्यों वे भारत से स्वयं को अलग नहीं कर पाए और बहुत से ऐसे लोग जो इस देश को छोड़ कर दूसरे देशों में बस गए साथ ही वहां सफलता के सर्वोच्च शिखर पर विराजमान हैं| इन सब का अर्थ यह कतई नहीं कि हर भारतीय इन २ श्रेणियों में आता हो यहाँ आज भी एक वर्ग ऐसा है जिसके लिए एक वक्त का भोजन जुटा पाना ही बड़ी सफलता के रूप में निरुपित होता है| आज़ादी के लगभग ७५ वर्षों के उपरांत भी हम आर्थिक आज़ादी, सामाजिक सुरक्षा, सामजिक सौहार्द जैसी परिस्थियों को प्राप्त करने से कोसों दूर हैं|